1-मेरे आदर्श महापुरुष
मेरे आदर्श महापुरुष पूज्य संत श्री असंग देव साहब जी हैं। असंग देव जी कबीर पंथी संत हैं। इनका जन्म 20 अक्टूबर सन 1966 को ग्राम सहानियापुर जिला लखीमपुर खीरी में हुआ था। इनके पिता श्री महादेव प्रसाद एक साधारण किसान थे तथा माता श्रीमती पार्वती देवी अत्यंत शांत स्वभाव की धार्मिक महिला थी। इनकी माता जी का अधिकांश समय साधु संतों की सत्संग में व्यतीत होता था। असंग देव जी की बचपन से ही संत बनने की इच्छा उत्पन्न हुई इन्होंने कई सालों तक एक अच्छे गुरु की तलाश की लेकिन इन्हें अच्छा गुरु नहीं मिल सका कारण यह था कि यह जिस भी संत के पास जाते थे उनके अंदर किसी न किसी प्रकार का विषय भोग या फिर नशा व्यसन करते थे। इस प्रकार यह उन्हें अपना गुरु नहीं बनाते थे।पूज्य संत श्री असंग देव जी
बहुत समय तक गुरु की तलाश करते करते एक बार इनकी मुलाकात श्री क्षमा देव जी से हुई। क्षमा देव जी ने इन्हें गुरु मंत्र दिया। श्री असंग देव जी का मुख्य उद्देश समाज में व्याप्त बाह्य आडंबर तथा अंधविश्वास को मिटाना और समाज में जो विभिन्न प्रकार के लोगों के बीच आपस में मनमुटाव ईर्ष्या दोष है उसको मिटा कर लोगों के अंदर प्रेम तथा विश्वास की भावना उत्पन्न करना और सबसे मुख्य बात यह है कि हमारे समाज में जितने भी प्रकार के नशा व्यसन व्याप्त हैं लोगों को उनसे छुटकारा दिलाना। गुरु मंत्र लेने के बाद असंग देव जी गांव गांव में जाते थे और जो भी व्यक्ति उन्हें नशा व्यसन करते या टाइम पास करते मिल जाते थे वह वहीं पर उन्हें समय के सही सदुपयोग तथा नशा से होने वाले नुकसान के बारे में अवगत कराते थे। और भविष्य में ऐसा ना करने का संकल्प भी दिलाते थे।
आज परम पूज्य श्री असंग देव साहब जी एक राष्ट्र संत हैं उनके कई आश्रम हैं। उनका प्रथम आश्रम गुरुधाम आश्रम मुस्तफाबाद लखीमपुर खीरी में है। तथा दूसरा आश्रम कोटा राजस्थान में है और तीसरा आश्रम रायपुर छत्तीसगढ़ में है और एक आश्रम उज्जैन मध्य प्रदेश में है। इन आश्रमों में दुर्बल दीन दुखी बेसहारा लोगों को की सेवा की जाती है।
वे केवल एक संत ही नहीं एक महान देशभक्त, वक्ता, विचारक, लेखक और मानव प्रेमी भी हैं। उनका विश्वास है कि पवित्र भारतवर्ष धर्म एवं दर्शन की पुण्य भूमि है। यह त्याग एवं समर्पण की भूमि है। उन्होंने लोगों से आह्वान किया कि-
" यदि हम जीवन किसी को जीवन दे नहीं सकते तो किसी का जीवन लेने का अधिकार भी नहीं है एक बुद्धिमान प्राणी होने के नाते हमारा यह धर्म होता है कि हम अन्य जीवो का कल्याण करें ना कि उनका वध करें। ''
वह पुरोहितवाद व धार्मिक आडम्बरों के सख्त खिलाफ थे। उन्होंने मानव सेवा ही ईश्वर की सेवा माना। उनका कहना था कि -
" देश के भूखे दरिद्र कुपोषण के शिकार लोगों को देवी-देवताओं की तरह मंदिरों में स्थापित कर दिया जाए और मंदिरों से देवी देवताओं की मूर्तियों को हटा दिया जाए। "
आज लाखों की संख्या में लोग उनके उपदेशों को चुनते हैं तथा अपने जीवन को सही दिशा में अग्रसर करते हैं। टीवी में आस्था भजन चैनल पर रात 9:00 बजे से लेकर 9:20 तक उनका सत्संग प्रसारित किया जाता है जिसे करोड़ों की संख्या में लोग सुनते हैं और अपने जीवन को परिवर्तित करते हैं मुझे भी उन्हें सुनकर बहुत अच्छा लगा मैं अधिकांश समय पर उनके वीडियो देखता रहता हूं तथा उनके उपदेश सुनता हूं।
2- मेरा पसंदीदा स्थल (प्रभाष गिरि पर्वत, कौशांबी)
प्रभास गिरी पर्वत कौशांबी जिले के पभोसा नामक ग्राम में यमुना नदी के किनारे स्थित है। यह पर्वत दिगंबर जैन तीर्थंकर श्री पदम प्रभु की तप एवं ज्ञान का क्षेत्र रहा है। यह पर्वत गंगा एवं यमुना नदी के बीच के दोआबा क्षेत्र का एकमात्र पर्वत है। गंगा और यमुना इन दोनों नदियों के बीच का जो दोआब क्षेत्र है उस क्षेत्र में प्रभास गिरी पर्वत ही एकमात्र पर्वत है इसके अलावा इस क्षेत्र में कोई पर्वत नहीं है।यह पर्वत दिगंबर जैन धर्म के तीर्थंकर पदम प्रभु की तपोस्थली रहा है। पर्वत की तलहटी में दिगंबर जैन मंदिरों का निर्माण किया गया है यह पर्वत सामरिक रूप से ही नहीं बल्कि ऐतिहासिक रूप से भी महत्वपूर्ण है। पर्वत के शीर्ष पर एक भव्य मंदिर बना है।
तीर्थंकर पद्मप्रभु की तपोस्थली
यह पर्वत रेल सेवा से इलाहाबाद- कानपुर मुख्य लाइन पर 35 किलोमीटर की दूरी पर भरवारी रेलवे स्टेशन से जुड़ा है। यह पर्वत कानपुर से 160 किलोमीटर तथा इलाहाबाद से 70 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इसके निकटवर्ती तीर्थ क्षेत्र कौशांबी 15 किलोमीटर तथा प्रयागराज 70 किलोमीटर की दूरी पर हैं। इस पर्वत की सुंदरता में चार चांद लगाती हुई यमुना नदी पर्वत को स्पर्श करती हुई बहती है।
पर्वत के शीर्ष तक पहुंचने के लिए सीढियां
पर्वत के शीर्ष तक पहुंचने के लिए उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग द्वारा सीढ़ियों का निर्माण कराया गया है। प्रकृति के मनोरम दृश्य की अनुभूति के लिए पर्वत की चोटी पर पहुंच कर इसका एहसास किया जा सकता है। यहां की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां जाने के लिए हर मौसम अनुकूल है। उत्तर प्रदेश पर्यटन का यह एक मुख्य स्थल है। इस पर्वत की तलहटी में प्रत्येक वर्ष मकर संक्रांति के अवसर पर एक बड़े भव्य मेले का आयोजन किया जाता है। इस मेले में दूर-दूर के लोग तथा दार्शनिक आते हैं और यमुना नदी में डुबकी लगाकर तीर्थंकर पदम प्रभु के दर्शन करते हैं तथा पर्वत पर चढ़कर वहां से प्राकृतिक दृश्य का और यमुना नदी का अवलोकन करते हैं।
3-मेरा बचपन
''बचपन हर गम से बेगाना होता है, बचपन का हर दिन खुशियों का खजाना होता है।।''
मेरे बचपन के कुछ पल
बात कुछ ऐसी ही है मेरे भी बचपन की। मेरा नाम मनोज कुमार है मेरा बचपन मेरे अपने ही गांव छिलोलर पर व्यतीत हुआ। आज जब बचपन की याद आती है तो मन रुक सा जाता है बचपन में व्यतीत किए हुए उन पलों पर। हालांकि जब बचपन की बात होती है तो शरारत की बात भी होती है। लेकिन मेरा बचपन शरारत भरा नहीं था मैं अपने मित्र मंडली में बहुत ईमानदारी, सरल और शांत भाव से रहा करता था। मैंने अपने ग्रुप में ऐसे मित्रों को रखें जो सत्य और इमानदार थे। चोरी या शरारत से हमारे बचपन का नाता कभी नहीं रहा और ना आज है। हमारा बचपन - "जो प्राप्त है वह पर्याप्त है।" के सिद्धांत पर व्यतीत हुआ। मैंने अपने बचपन की पढ़ाई अपने गांव से ही पूरी की।
बचपन में बेर खाने जाना
बचपन के दिनों में साइकिल का टायर घुमाते घुमाते बेर खाने जाना और खेतों में जाकर बेर तोड़ कर खाना बहुत पसंद था। कभी-कभी तो खेतों पर घूमते घूमते बेर खाते खाते इतनी देर हो जाती थी कि समय पर स्कूल भी नहीं पहुंच पाते थे फिर दूसरे दिन विद्यालय पहुंचने पर कक्षा अध्यापक की डांट भी सुननी पड़ती थी। स्कूल की गर्मियों की छुट्टी में भैंस गाय भी चराने ने के लिए खेतों पर जाते थे और कभी कभी खेल खेलने पर इतने व्यस्त हो जाते थे कि भैंस और गाय गुम हो जाती थी तो फिर उन्हें घर में पता चलने से पहले भूखे-प्यासे ढूंढना पड़ता था। कभी-कभी ढूंढते ढूंढते तो पूरा दिन लग जाता था क्योंकि घर में मार पड़ने का डर बना रहता था।
बचपन का खेल गिल्ली-डन्डा
मेरा बचपन गांव में बीता। हमारे गांव में इमली और बेल के अत्यधिक मात्रा में वृक्ष है। इन वृक्षों पर चढ़कर इमली तोड़ना और बेल तोड़कर खाना और मित्रों को खिलाना बहुत अच्छा लगता था। मेरा जन्म एक गरीब घराने में हुआ इसलिए मुझे ज्यादा भौतिक संसाधनों का साथ तो नहीं मिल सका, लेकिन प्रकृति की गोद ने जो जीवन के लिए जरूरी था वह सब कुछ दिया।
मुझे अपने गांव के पेड़ पौधों खेत खलिहान तथा मिट्टी से इतना प्यार है कि मैं जब भी अपने गांव को छोड़कर कुछ दिनों के लिए किसी काम से बाहर जाता हूं तो उस मिट्टी की बहुत याद आती है जिसमें बचपन गुजारा था
मेरे बचपन के कुछ पल
बात कुछ ऐसी ही है मेरे भी बचपन की। मेरा नाम मनोज कुमार है मेरा बचपन मेरे अपने ही गांव छिलोलर पर व्यतीत हुआ। आज जब बचपन की याद आती है तो मन रुक सा जाता है बचपन में व्यतीत किए हुए उन पलों पर। हालांकि जब बचपन की बात होती है तो शरारत की बात भी होती है। लेकिन मेरा बचपन शरारत भरा नहीं था मैं अपने मित्र मंडली में बहुत ईमानदारी, सरल और शांत भाव से रहा करता था। मैंने अपने ग्रुप में ऐसे मित्रों को रखें जो सत्य और इमानदार थे। चोरी या शरारत से हमारे बचपन का नाता कभी नहीं रहा और ना आज है। हमारा बचपन - "जो प्राप्त है वह पर्याप्त है।" के सिद्धांत पर व्यतीत हुआ। मैंने अपने बचपन की पढ़ाई अपने गांव से ही पूरी की।
बचपन में बेर खाने जाना
बचपन के दिनों में साइकिल का टायर घुमाते घुमाते बेर खाने जाना और खेतों में जाकर बेर तोड़ कर खाना बहुत पसंद था। कभी-कभी तो खेतों पर घूमते घूमते बेर खाते खाते इतनी देर हो जाती थी कि समय पर स्कूल भी नहीं पहुंच पाते थे फिर दूसरे दिन विद्यालय पहुंचने पर कक्षा अध्यापक की डांट भी सुननी पड़ती थी। स्कूल की गर्मियों की छुट्टी में भैंस गाय भी चराने ने के लिए खेतों पर जाते थे और कभी कभी खेल खेलने पर इतने व्यस्त हो जाते थे कि भैंस और गाय गुम हो जाती थी तो फिर उन्हें घर में पता चलने से पहले भूखे-प्यासे ढूंढना पड़ता था। कभी-कभी ढूंढते ढूंढते तो पूरा दिन लग जाता था क्योंकि घर में मार पड़ने का डर बना रहता था।
बचपन का खेल गिल्ली-डन्डा
मेरा बचपन गांव में बीता। हमारे गांव में इमली और बेल के अत्यधिक मात्रा में वृक्ष है। इन वृक्षों पर चढ़कर इमली तोड़ना और बेल तोड़कर खाना और मित्रों को खिलाना बहुत अच्छा लगता था। मेरा जन्म एक गरीब घराने में हुआ इसलिए मुझे ज्यादा भौतिक संसाधनों का साथ तो नहीं मिल सका, लेकिन प्रकृति की गोद ने जो जीवन के लिए जरूरी था वह सब कुछ दिया।
मुझे अपने गांव के पेड़ पौधों खेत खलिहान तथा मिट्टी से इतना प्यार है कि मैं जब भी अपने गांव को छोड़कर कुछ दिनों के लिए किसी काम से बाहर जाता हूं तो उस मिट्टी की बहुत याद आती है जिसमें बचपन गुजारा था
4-मेरे प्रिय शिक्षक
श्री दया करण सिंह मेरे प्रिय शिक्षक हैं। वे पूर्व माध्यमिक विद्यालय छिलोलर में पढ़ाते हैं। शिक्षक एक माली के रूप में ना केवल पौधे रूपी विद्यार्थियों को पोषित करता है बल्कि उन्हें एक बेहतर मनुष्य के रूप में पल्लवित कर संस्कार रूपी पुष्प खिलाकर सद्गुणों की महक भी देता है। हमारे मानसिक एवं सामाजिक स्तर को बनाने में शिक्षक का महत्वपूर्ण स्थान है।
श्री दया करण करण सिंह पूर्व माध्यमिक विद्यालय के विज्ञान विषय के शिक्षक हैं। उस स्कूल में अनेक शिक्षक शिक्षिकाएं हैं जो बच्चों को अलग-अलग विषय ज्ञान देते हैं। सभी शिक्षक बहुत अच्छे व सम्मानीय हैं। श्री दया करण सिंह बहुत सरल व परिश्रमी है। वह बहुत ही अनुशासित और समय के पाबंद शिक्षक हैं। वह अनुशासन को स्वयं के जीवन में लागू कर विद्यार्थियों के सामने उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। वह कक्षा से संबंधित सभी कार्य और प्रोजेक्टों को देरी किए बिना सही समय पर पूरा कराते हैं। मैं उन्हें बहुत पसंद करता हूं क्योंकि वह हमें पढ़ाने वा अच्छी चीजों को सिखाने के लिए अच्छी शिक्षा पद्धतियों का प्रयोग करते हैं। श्री दया करण सिंह के अतिरिक्त वह हमारा चरित्र अच्छा बनाने के लिए अच्छी नैतिकता वाले आचरण को सिखाते हैं। उनकी दी गई शिक्षाएं हमेशा मेरे साथ रहेंगी तथा कठिन समय में हमें सही रास्ता दिखाएंगी।
वह स्वभाव से बहुत अधिक विनम्र वह मृदुभाषी हैं। उनकी भाषा शैली उच्च कोटि की है। वह कमजोर तथा बुद्धिमान बच्चों में कोई भेदभाव नहीं करते हैं। वह हमें हमेशा प्रोत्साहित करते हैं। वह अपनी जिम्मेदारियों को अच्छे से निभाते हैं। वह सभी विद्यार्थियों से नम्रता से बात करते हैं। वह नियमित रूप से कक्षा में उपस्थित होते हैं। सभी विद्यार्थी उनकी कक्षा में उपस्थित रहते हैं। तथा उनकी कक्षा लेने में रुचि रखते हैं।
वह हमेशा कुछ नया सिखाते हैं उनका व्यक्तित्व एकदम अलग है। वह सभी प्रकार के छल - दंभ - - पाखंड- झूठ और अन्याय से दूर रहते हैं। वह हमेशा कहते हैं कि - "सच्चा और सार्थक उपदेश वही है वाणी से नहीं बल्कि अपने आचरण के द्वारा प्रस्तुत किया जाता है"
मैं आजीवन उनका ऋणी रहूंगा उनकी शिक्षाएं मेरे जीवन को हमेशा मार्गदर्शन करती रहेंगी
5- मेरा प्रिय मित्र
मेरा प्रिय मित्र अरविंद कुमार है। अरविंद का गांव और मेरा गांव एक ही है। मैं और मेरे मित्र का बचपन साथ साथ गुजरा है हम दोनों प्राथमिक तथा उच्च प्राथमिक की शिक्षा साथ-साथ प्राप्त किए हैं। अरविंद का स्वभाव अत्यंत सरल और सुशील है मेरे मित्र की रुचियां मेरी रूचियों से मिलती हैं जो मुझे पसंद होता है वह उसे भी पसंद होता है। कहा जाता है कि प्रेम विश्वास की नींव पर टिका होता है। जहां विश्वास की बात है तो मेरे मित्र का व्यवहार एक आदर्श प्रस्तुत करता है। उसके पिता पेसे से एक मजदूर हैं। मेरे और अरविंद के परिजन सभी एक दूसरे को जानते हैं। हमारी मित्रता बचपन से ही है हमारे विचार समान है हमारी मित्रता में स्वार्थ की भावना दूर दूर तक नहीं है ।
अरविंद बहुत नम लड़का है उसका उत्साह और आत्मविश्वास गजब का है। उसकी वाणी से नम्रता और शालीनता साफ झलकती है। उसे मैंने किसी भी व्यक्ति के साथ अभद्र व्यवहार करते नहीं देखा। खेल में क्रिकेट हम दोनों का पसंदीदा खेल है। वह खेल में हारकर कभी उदास नहीं होता।
वह समय का बहुत पाबंद है उसी ने मुझे समय का महत्व समझाया है। सच्चे मित्र की परीक्षा विपत्ति में होती है। अरविंद हमेशा मेरी सहायता करने के लिए तैयार रहता है। कहते हैं सच्चा मित्र ईश्वर का अमूल्य उपहार होता है ।




























